नई दिल्ली .जनता जर्नादन के आगे लोकतंत्र में सब बौने हैं। हाथ जोड़कर वोट मांगने वालों को भले ही जनता अपने दरवाजे पर अभिवादन करती हो, लेकिन मतदान के वक्त अधिकांश उम्मीदवारों को करारा जवाब भी देती है। चुनाव जीतना तो दूर जनता कई धुरंधरों को जमानत बचाने का मौका भी नहीं देती है। दिल्ली के पिछले तीन विधानसभा चुनावों साल 2008, 2013 और 2015 में भाजपा ,कांग्रेस और बीएसपी प्रत्याशियों को जमानत बचाना मुश्किल हो गया था। इन तीन चुनावों ने औसतन 80 फीसदी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2015 में बीजेपी के 69 में से 2 प्रत्याशियों की जमानत नहीं बची थी। बीएसपी के 70 में से 69 और कांग्रेस के 70 में से 62 प्रत्याशी जमानत नहीं बचा पाए थे।
| विधानसभा चुनाव | उम्मीदवार | जमानत जब्त |
| 2008 | 875 | 711 |
| 2013 | 880 | 682 |
| 2015 | 743 | 595 |
कांग्रेस के 62 और बीएसपी के 69 उम्मीदवारों की जमानत जब्त
विस. चुनाव 2015 में कांग्रेस के 70 में से 62 उम्मीदवार जमानत तक नहीं बचा पाए। बीएसपी 70 में से 69 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। इस चुनाव में बीजेपी को 3 सीट पर जीत मिली लेकिन 68 उम्मीदवार जमानत बचाने में कामयाब रहे।
कब जब्त होती है जमानत?
जब कोई प्रत्याशी किसी भी चुनाव क्षेत्र में पड़े कुल वैध वोट का छठा हिस्सा हासिल नहीं कर पाता है तो उसकी जमानत राशि जब्त मानी जाती है और नामांकन के दौरान दी गई राशि उन्हें वापस नहीं मिलती है। जैसे अगर किसी सीट पर 1 लाख लोगों ने वोट दिया है और उम्मीदवार को 16666 से कम वोट हासिल हुए हैं। तो उसकी जमानत जब्त हो जाएगी।
क्या है जमानत राशि?
किसी भी चुनाव में जब प्रत्याशी चुनाव लड़ता है तो पर्चा भरते वक्त उसे एक निश्चित रकम जमानत के तौर पर चुनाव आयोग में जमा करनी होती है। इसी राशि को चुनावी जमानत राशि कहते हैं। यह राशि कुछ मामलों में वापस दे दी जाती है अन्यथा आयोग इसे अपने पास रख लेता है।
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