एसडी कॉलेज के संस्कृत विभाग और सनातन धर्म मानव विकास शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र के सहयोग से 21वीं शताब्दी में हिंसा और अहिंसा की डीकोडिंग विषय को लेकर विभिन्न विषय को लेकर तीन दिवसीय लघु-चर्चा आयोजित की। इसमें डाॅ. आरके शर्मा, डाॅ. प्रदीप, डाॅ. आरके गुप्ता, डाॅ. जयप्रकाश गुप्त, डॉ. आशुतोष अंगिरस, अनिल सहित अन्यों ने वीडियो कालिंग के माध्यम से अपने विचार साझा किए।
करीब तीन घंटे चली चर्चा का सार स्पष्ट करते हुए आशुतोष अंगिरस ने बताया कि भारतीय परम्परा में हिंसा और अहिंसा दोनों विषयों पर विस्तृत निरंतरर चर्चा व व्यवहार देखने को मिलता है। इस विषय में ध्यान रखना होगा कि अहिंसा की बात करते ही हम में से कुछ गांधी को अहिंसा का आदर्श स्वीकार नहीं करते। क्योंकि गांधी ने अहिंसा को एक टूल की तरह स्वतंत्रता आंदोलन में प्रयोग किया है। अहिंसा की पराकाष्ठा तो केवल महावीर जैन के आचार और विचार में दिखाई देती है। हालांकि वैदिक, बौद्ध और जैन परम्परा में भी अहमियत बताई गई है। “अहिंसा” का अर्थ है सर्वदा तथा सर्वथा का अर्थ है सब प्राणियों के साथ द्रोह का अभाव।
अहिंसा के मार्ग का अर्थ बहुत गहरा है। किसी ने एक पत्थर उठाया और किसी को चोटिल करने के लिए फेंका और वह पत्थर नहीं लगा और किनारे से निकल गया। कोई चोट नहीं पहुंची तो भी व्यक्ति की हिंसा पूरी हो गई। असल में जब पत्थर फेंकने का ख्याल आया तब हिंसा प्रकट हुई। पत्थर फेंकने की कामना की, आकांक्षा की, वासना की, तभी हिंसा पूरी हो गई। पत्थर फेंकने की वासना की, तब भी हिंसा सामने प्रकट हुई। पत्थर फेंकने की वासना की जा कर सकती है, इसकी संभावना व्यक्ति के अचेतन में छिपी है, तभी हिंसा हो गई। हिंसा का संबंध किसी को मारने से नहीं, हिंसा का संबंध मारने की इच्छा से है। जब तक मनुष्य के मन में इंद्रियों का लोभ है, तब तक हिंसा से मुक्ति असंभव है। जब तक आदमी इंद्रियों को तृप्त करने के लिए विक्षिप्त है, तब तक हिंसा से मुक्ति असंभव है।
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