सफर में जुटाई गांव के बारे में जानकारी
19 मार्च की शाम को जयपुर से कार लेकर करीब पौने 200 किलोमीटर दूर करौली के लिए रवाना हुआ। सफर के दौरान ही करौली में मौजूद परिचितों से बातचीत की। पता चला कि मुकेश का घर शहर से करीब चार किमी. दूर कल्लदेह गांव में है। यह भद्रावती नदी का किनारे है जहां तक कार से नहीं पहुंचा जा सकता है। बीहड़ के बीच है यह गांव जहां पैदल जाना पड़ेगा। एक बारगी बीहड़ व नदी के बारे में सुना तो रोमांच हुआ। 19 मार्च को ही रात 10:30 बजे करौली पहुंचकर होटल में ठहरा। हालांकि, मन में सवाल उठ रहा था कि कल्लदेह तक बीहड़ों के बीच सुबह पांच बजे कैसे पहुंच पाऊंगा।
व्हाट्सएप से परिचित को कॉल किया, उनकी मदद से गांव पहुंचा
सुबह साढ़े पांच बजे फांसी से पहले कल्लदेह पहुंचना था। रास्ता अनजान, दुर्गम और डरावना था। ऐसे में परिचित व्यक्ति का ध्यान आया। उनसे सोशल मीडिया के जरिए पहचान हुई थी। लाइव रिपोर्टिंग के चैलेंज को पूरा करने का इतना जुनून था कि सुबह साढ़े 4 बजे ही उन्हें फोन किया। उन्हें बताया कि मुझे साढ़े 5 बजे पहले कल्लादेह पहुंचना है। एकबारगी नाम सुनकर वह हैरान रह गए। लेकिन, आग्रह करने पर करौली के सामान्य चिकित्सालय पहुंच गए। वहां कार खड़ी की। फिर बाइक लेकर कल्लादेह के लिए रवाना हुए। कस्बे से कुछ किलोमीटर दूर बीहड़ के बीच रास्ता शुरू हो गया। कच्चे-पक्के रास्ते में बाइक चला रहे साथी ने बीहड़ों में घटी घटनाओं के बारे में बताया।
एक बार मन में आया वापस लौट चलते हैं
बीहड़ के रास्तों में एक बार मन में सवाल आया कि शायद कल्लादेह तक पहुंचने का निर्णय गलत है। अंधेरे में सवेरे 5 बजे पहुंचना गलत है। वापस लौट चलते हैं। उजाला होने पर वापस आ जाएंगे। क्योंकि बीहड़ों में कुछ गलत न हो जाए। रास्ता पूरी तरह से अनजान और डरावना था लेकिन फिर मन में आया चलो, जो होगा देखा जाएगा। 5.20 बजे बीहड़ों से निकलकर भद्रावती नदी के किनारे पहुंचे। वहां बाइक खड़ी की। फिर नदी के किनारे-किनारे पैदल चलते हुए मुकेश के गांव पहुंचे। वहां सन्नाटा पसरा था।
गांव में पांच से छह छप्पर वाले घर हैं। इन्हीं में से एक मुकेश का घर भी है। छप्परनुमा घर नदी के किनारे बना है, जो अब बंद रहता है। कभी यहां उसकी मां कल्याणी रहती थी, जो बेटे की करतूत के बाद गांव छोड़कर जा चुकी है। आसपास भी कोई घर नहीं है। करीब 100 से 150 मीटर दूर एक दूसरा छप्पर वाला घर मिलता है, यहां कुछ लोग रहते हैं। जब हमने इन लोगों से बात की तो जवाब मिला, हम अपनी जुबान पर उसका नाम भी नहीं लेना चाहते हैं।
गांव के लोगों ने बातचीत में बताया कि मुकेश बचपन में ही यहां से चला गया था लेकिन, उसका जन्म यहीं हुआ था। इस कारण हमें भी शर्मसार होना पड़ता है। उसकी हैवानियत ने इस बस्ती के साथ-साथ पूरे करौली जिले को शर्मसार कर दिया। कुकर्म करने वालों को फांसी की सजा होना कानून और न्याय की जीत है। उसे तो फांसी हो गई लेकिन पता नहीं हमारी बस्ती और करौली जिले पर लगा यह दाग अब कभी धुल पाएगा या नहीं।
मुकेश का बड़ा भाई राम सिंह भी निर्भया केस का मुख्य दोषी था। दोनों साथ में ही दिल्ली में रहते थे। राम सिंह ड्राइवर था और मुकेश खलासी का काम करता था। राम सिंह की पत्नी की मौत होने के बाद वो शराब पीने का आदी हो गया था। दोषी राम सिंह ने ट्रायल के दौरान ही तिहाड़ जेल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।
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