कोरोना से जंग लड़ रहे 2 स्वास्थ्य योद्धाओं ने मानवता की एक नई मिसाल पेश की। इन्होंने जो काम किया उसमें जोखिम जरूर था लेकिन 2 जिंदगियों का सवाल भी। दरअसल, यह वाकया है बुधवार देर रात करीब सवा 2 बजे का। मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित बरवाला के गांव खेदड़ की एक ढाणी का। यहां प्रसव पीड़ा से कराह रही कोराेना को हराकर होम आइसोलेट गर्भवती के लिए एंबुलेंस में तैनात इमरजेंसी मेडिकल टेक्निशियन सुखपाल और चालक रोहताश फरिश्ता बनकर पहुंचे थे।
इन्होंने विषम परिस्थितियों के बीच बिना वक्त गंवाए मकान में ही गर्भवती की सुरक्षित डिलीवरी करवा दी। इस दौरान ढाणी की बत्ती गुल थी। ऐसे में मोबाइल टॉर्च की रोशनी में जोखिम उठाना मुनासिब समझते हुए जच्चा-बच्चा की जिंदगी बचा ली। इसके बाद दोनों को सिविल अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती करवा दिया। एडवांस लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस के नाम को सार्थक करने वाले स्वास्थ्य योद्धा सुखपाल और रोहताश की चौतरफा प्रशंसा हो रही है।
बता दें कि रोहतक पीजीआई में गर्भवती दाखिल हुई थी। वह कोरोना संक्रमित थी जोकि वहां उपचाराधीन थी। वहां से कोरोना को हराकर गर्भवती को 21 जुलाई को होम आइसोलेट कर दिया था। अब जच्चा-बच्चा काे कोरोना संदिग्ध मानते हुए कोविड सैंपल जांच के लिए भिजवाया है ताकि यह पता चल जाए कि संक्रमण से सुरक्षित है या नहीं।
ईएमटी से जानिए.... परिस्थितियां विषम थी मगर हौसला नहीं डगमगाया : सुखपाल
बुधवार देर रात करीब 2.10 बजे की बात है। कोविड ट्रांसपोर्ट मैनेजमेंट इंचार्ज डॉ. समीर कंबोज के निर्देश मिले थे। बरवाला के गांव खेदड़ की ढाणी से होम आइसोलेट गर्भवती को लाकर सिविल अस्पताल में भर्ती करवाना है। तुरंत चालक रोहताश के साथ एंबुलेंस लेकर खेदड़ पहुंच गए। रास्ता ठीक नहीं होने पर मेन रोड पर एंबुलेंस खड़ी कर करीब दो किले तक पैदल चलकर ढाणी में पहुंचे थे। वहां लाइट नहीं थी। परिवार से कहा कि गर्भवती को साथ भेज दो। जब वहां से चलने लगे तो उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। कंडीशन देख लगा कि सिविल अस्पताल पहुंचने से पहले एंबुलेंस में डिलीवरी हो जाएगी। जान का खतरा हो सकता है। तभी डिसीजन लिया कि डिलीवरी तो मकान में करवानी होगी।
पीपीई किट पहनकर मोबाइल टॉर्च की रोशन में डिलीवरी करवाई। इसमें करीब पौना घंटा लगा। एडवांस लाइफ सपोर्ट में जीवन रक्षक संबंधित प्राइमरी उपकरण मौजूद रहते हैं, जिनका प्रयोग किया था। डिलीवरी हुई और बच्ची को जन्म दिया। उसकी नाल काटकर साफ कपड़े में लपेटा। मौके पर इंफेक्शन से बचाव के लिए सफाई की। दोनों को फिर एंबुलेंस में बैठाकर सिविल अस्पताल पहुंचाया। संक्रमण से बचाव के लिए परिवार का कोई और सदस्य सहयोग नहीं कर सकता था। इसलिए मेरी रोहताश ने मदद की। जोखिम था लेकिन सात-आठ साल का अनुभव था इसलिए हौसला नहीं डगमगा। :- जैसा कि इमरजेंसी मेडिकल टेक्निशियन सुखपाल ने बताया।
एक तरह से रेस्क्यू ऑपरेशन था, सफल रहे : डॉ. समीर
गर्भवती पहले रोहतक पीजीआई में दाखिल थी। कोरोना को हराकर होम आइसोलेट कर दिया था। इसकी जानकारी मिली तो डॉक्टर्स से बातचीत करके सिविल अस्पताल में आइसोलेट करवाने के लिए एंबुलेंस भिजवाई थी। वहां एंबुलेंस लेकर पहुंचे ईएमटी सुखपाल और चालक रोहताश से जानकारी मिली कि गर्भवती की हालत गंभीर है। तब दोनों ने बिना वक्त गंवाए डिलीवरी करवाई, जिसमें ईएमटी ने अहम भूमिका निभाई। स्वस्थ डिलीवरी के दौरान लड़की पैदा हुई। एक तरह से रेस्क्यू ऑपरेशन था, जिसमें सफल रहे। अब प्रसूता-नवजात आइसोलेट हैं। एंबुलेंस टीम ने वाकई 2 जिंदगियों को बचाकर मानवीय एवं सराहनीय काम किया है।
एंबुलेंस मेल स्टाफ ने अनुभव से दो जिंदगियों को बचाया
यह मामला संज्ञान में आया है। एंबुलेंस मेल स्टाफ ने ढाणी में विषम परिस्थितियों के बीच सुरक्षित डिलीवरी करवा दी। दो जिंदगियों को अपने अनुभव से बचाया है। स्टाफ ने प्रशंसनीय काम किया है। अगर हमने कुछ सीखा हुआ है और इमरजेंसी में वह ज्ञान या अनुभव काम आता है तो उसे इस्तेमाल करना चाहिए। - डॉ. जितेंद्र शर्मा, डिप्टी सिविल सर्जन एवं एंबुलेंस ट्रांसपोर्ट इंचार्ज।
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