राई हलके के बढ़खालसा गांव में जन्मे स्व. रिजकराम दहिया ने राजनीति कैरियर की फिफ्टी लगाई। वकालत के पेशे से होते हुए 1952 में संयुक्त पंजाब में पहली बार राई सीट से विधायक बने। 1957 का इलेक्शन हुकुम सिंह से हार गए। 1962, 1967, 1972, 1977 में फिर विधायक बने। 1969 में राज्यसभा सदस्य बने, 1996 में सांसद का चुनाव निर्दलीय प्रत्याशी अरविंद शर्मा से हार गए। इसके बाद राजनीति से दूर हो गए। अब इनके बेटे जयतीर्थ दहिया लगातार दो बार विधायक बने हैं। जयतीर्थ ने अपने पिता की यादों और उस दौर को सांझा किया।
आजादी के बाद पहले चुनाव में कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी था। प्रचार में बैल लेकर जाते थे। बैल भीड़ में बिदक न जाए इसलिए किसानों की ड्यूटी लगाई जाती थी। 1952 में संयुक्त पंजाब में विधानसभा चुनाव लड़ने वाले कई कांग्रेस उम्मीदवारों ने बैलों व बैलगाड़ी से चुनाव प्रचार किया। वकील रहे पिता रिजकराम पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने हिंदी भाषी चंडीगढ़ पंजाब को दिए जाने के विरोध में राज्यसभा सांसद से इस्तीफा दे दिया था। अब राजनीति में स्वार्थ हावी है। नेताओं के किसी मामले में फंसने पर इस्तीफ तो हो जाते हैं, लेकिन जनहित के मुद्दे पर इस्तीफा देना संभवत: नहीं दिखता। 1967 में सीए बनाने की उठापटक के बाद कांग्रेस नाराज हुई।
पं. भगवतदयाल और रिजकराम को 1968 में टिकट नहीं मिली। बाद में 1969 में इन्हें राज्यसभा सदस्य बनाया गया। 1952 में हुए पहले चुनाव में कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिह्न ‘दो बैलों की जोड़ी’ था तो भारतीय जनसंघ का ‘दीपक’ और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का ‘झोपड़ी’। फिर कांग्रेस का ‘पंजा’ हो गया तो जनसंघ से भाजपा बनने के बाद चुनाव चिह्न ‘कमल’ हो गया। कांग्रेस ने पहला चुनाव इसी चिह्न पर जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई में लड़ा और सरकार बनाई। 1970-71 में कांग्रेस में विभाजन हुआ। पार्टी से अलग हुए मोरारजी देसाई, चंद्रभानू गुप्ता ने संगठन कांग्रेस बनाई। विभाजन होते ही चुनाव चिह्न ‘दो बैलों की जोड़ी’ विवादित हो गया सो चुनाव आयोग ने उसे सीज कर दिया। 1952 में कांग्रेस से दो बैलों की जोड़ी निशान पर बैलगाड़ी लेकर राई क्षेत्र से रिजकराम ने भी प्रचार कर चुनाव जीता। चिन्ह सीज होने के बाद इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस को चुनाव चिह्न ‘गाय और बछड़ा’ मिला जबकि संगठन कांग्रेस को ‘चरखा’ चुनाव चिह्न मिला।
दीपक निशान वाला जनसंघ भाजपा में बदला तो मिला कमल
वर्ष 1977 के चुनाव में ही ‘दीपक’ चिह्न वाले जनसंघ, ‘झोपड़ी’ चुनाव निशान वाली प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाले भारतीय क्रांति दल का विलय हुआ और जनता पार्टी बनी, जिसे चुनाव चिह्न मिला ‘कंधे पर हल लिए हुए किसान’। वर्ष 1979 में कांग्रेस में एक और विभाजन हुआ और उसे चुनाव चिह्न मिला ‘हाथ का पंजा’। इसी बीच जनता पार्टी भी बिखर गई और पूर्ववर्ती जनसंघ के नेताओं ने 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन किया, जिसे चुनाव चिह्न मिला ‘कमल का फूल’। चौधरी चरण सिंह की अगुवाई वाली लोकदल को ‘खेत जोतता हुआ किसान’ चुनाव चिह्न मिला।
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