बहरहाल, जब राज कपूर ने ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ का निर्माण प्रारंभ किया तब हिंसक फिल्मों का दौर चल रहा था। अत: हिंसा के दौर में मादकता दिखाने वाली फिल्म एक तरह से हिंसा का प्रतिरोध करती है। इसी फिल्म में लता मंगेशकर ने मधुरतम गीत गाए। उन दिनों खाड़ी देश में लता का एक कार्यक्रम हुआ और आयोजकों ने लता से प्रार्थना की कि वे कार्यक्रम ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ फिल्म के टाइटल गीत से शुरू न करें, क्योंकि इस्लाम मानने वाले श्रोता इसे पसंद नहीं करेंगे। लता ने कार्यक्रम में किसी तरह के परिवर्तन से इनकार कर दिया। आयोजकों को आश्चर्य हुआ जब श्रोताओं ने इस गीत को दोबारा सुनने की फरमाइश की। माधुर्य धर्मनिरपेक्ष होता है। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने गजब माधुर्य रचा था।
छपाक में सामाजिक सोद्देश्यता है। नूतन के पति बहल ने ‘सूरत और सीरत’ फिल्म बनाई थी। सचिन देव बर्मन ने पारंपरिक मानदंड पर एक कुरूप व्यक्ति की कथा प्रस्तुत करने वाली फिल्म ‘मेरी सूरत तेरी आंखें’ के लिए शैलेंद्र लिखित गीत बनाया था- ‘पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई, इक पल जैसे एक जुग बीता, जुग बीते मोहे नींद न आई...।’ मन्ना डे का गाया यह गीत आज भी श्रोताओं की आंख में नमी पैदा कर देता है। स्वयं सचिन देव बर्मन ने स्वीकार किया था कि उनकी यह धुन बंगाल के काजी नजरुल इस्लाम की एक रचना से प्रेरित है। समान सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के कारण यह संभव है कि सुदूर भविष्य में बंगाल के दोनों धड़े मिल जाएं। जैसे बर्लिन की दीवार ढह गई है। दीवारों के ढहने के कालखंड में डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका-मेक्सिको के बीच दीवार बनाने पर आमादा हैं। दु:खद यह है कि संकीर्णता व दीवारों को बनाने वाले अवाम में लोकप्रिय भी हैं। सत्य घटनाओं से प्रेरित फिल्मों में रानी मुखर्जी व विद्या बालन अभिनीत ‘नो वन किल्ड जैसिका’ भी सार्थक फिल्म थी।
हैवानियत के द्वारा तेजाब से अधजले चेहरे वाली साहसी महिलाएं अपने चेहरे को ढंकती नहीं। वे इसे वीरचक्र की तरह धारण करती हैं। तेजाब फेंकने वाले नपुंसक होते हैं। बहरहाल सौंदर्य चिकित्सा विधा हर तरह के दाग और एसिड प्रभाव से मुक्ति दिलाने का प्रयास कर रही है। इस क्षेत्र में नित नए प्रयोग हो रहे हैं। हैवानियत की शिकार महिलाएं त्वचा प्रत्यारोपण नहीं चाहतीं। वे केवल जख्म भर देना चाहती हैं, ताकि इन्फेक्शन न हो। वे कुरूपता का शृंगार नहीं करतीं, परंतु उन्हें इसे ढंकना भी पसंद नहीं। इस तरह की महिलाएं हैवानियत के खिलाफ चलता-फिरता पोस्टर बने रहना चाहती हैं। इससे हटकर विषय पर बनी ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ भी कमाल का प्रभाव पैदा करती है। नायिका स्वयं के लिए सजना-संवरना चाहती है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है। बाजार में तेजाब की बिक्री एक संयोजित व्यवसाय है। दुकानदार को लेखा-जोखा रखना होता है। दुकानदार के पास खरीदार की नीयत जान लेने का कोई तरीका नहीं है।
जयप्रकाश चौकसे
फिल्म समीक्षक
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