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Wednesday, 8 January 2020

नवजातों पर अव्यवस्था की मार. राजस्थान के कोटा और गुजरात में सर्दी से बच्चों की मौत के बाद भी सजग नहीं हरियाणा का हेल्थ विभाग

देशभर में कई जगह ठंड के कारण सरकारी अस्पतालों में बच्चों की मौत हो रही हैं। वहीं दूसरी तरफ हरियाणा में ठंड के मौसम में निमोनिया की वैक्सीन पिछले दो माह से खत्म है। जिसके चलते लोगों को प्राइवेट अस्पतालों में इस वैक्सीन पर 3 से 4 हजार रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। अव्यवस्थाओं का आलम यह है कि केवल नवंबर और दिसंबर माह में प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में 23 बच्चों की मौत हो चुकी है, इनमें सबसे ज्यादा 13 अकेले हिसार जिले में हैं। वहीं साल भर की बात करें तो प्रदेश में यह आंकड़ा हजारों में पहुंच जाता है। दरअसल बच्चों को निमोनिया से बचाने के लिए सरकारी अस्पतालों में नि:शुल्क न्यूमोकोकल कंजुगेट वैक्सीन (पीसीवी) लगाया जाता है। 0 से 1 साल तक के बच्चों को तीन बार टीका लगाया जाता है। पहला जन्म के डेढ़ माह, दूसरा साढ़े तीन माह और तीसरा नौ माह पर लगता है। लेकिन इसका भंडारण खत्म हुए करीब दो माह का समय बीत चुका है। करीब तीन से चार हजार रुपए कीमत वाली वैक्सीन की नए साल में सप्लाई की उम्मीद थी लेकिन अभी तक भी मुहैया नहीं हो पाई है। वैक्सीन के टेंडर व खरीद के लिए पेमेंट को लेकर मामला उलझा हुआ है। ऐसे में उन बच्चों को होल्ड पर रखा जा रहा है, जिन्हें पीसीवी का इंजेक्शन लगना बाकी है। मजबूरी में प्राइवेट अस्पताल में 3 से 4 हजार में वन टाइम इंजेक्शन लगवाना पड़ता है। इस पर डीजी हेल्थ सूरजभान कांबोज ने कहा कि कंपनी से बात हो चुकी है। दवा जल्द ही अस्पतालों में पहुंच जाएगी।

देशभर में ठंड से हो रही बच्चों की मौत, लेकिन हरियाणा में दो माह से निमोनिया की वैक्सीन खत्म, प्राइवेट में 4 हजार रु. करने पड़ रहे खर्च

अव्यवस्थाओं से हो रही हैं मौतें

हरियाणा के कस्बों में स्थापित सीएचसी से लेकर सरकारी अस्पतालों आदि में जरूरी सुविधाएं पूरी नहीं हैं। कई जिलों में तो एक-एक बाल रोग विशेषज्ञों पर ही पूरा जिला निर्भर कर रहा है। वहीं अस्पतालों में वार्मर मशीनों की भी काफी कमी है। जहां मशीनें पूरी हैं, वहां मशीन खराब होने के कारण एक-एक मशीन में दो से चार तक बच्चों को एक समय में लेटाया जा रहा है। जिसके कारण एक-दूसरे बच्चे से इंफेक्शन आदि होने का खतरा बना रहता है। कहीं पर फोटो थैरेपी मशीन खराब पड़ी है तो कहीं पर वेंटिलेटर की सुविधा नहीं है।

13 जिलों की ग्राउंड रिपोर्ट: कहीं वार्मर मशीनें कम तो कहीं खराब, एक में दो-दो बच्चे लेटा रहे

पानीपत: जिले में 11 पीडियाट्रिशियन की जरूरत है, लेकिन एमएस सहित है सिर्फ दाे ही हैं। स्टाफ नहीं हाेने से 14 में से 7 वार्मर खराब पड़े हैं या फिर चालू नहीं है। इन पर अभी दाे-दाे बच्चे लेटा रहे हैं। कई बार तो एक में 4 बच्चों को लेटाते हैं। जिससे संक्रमण का खतरा रहता है। जिले में दो माह में चार बच्चों की मौत हो चुकी है। वार्ड में सिर्फ एक डबल सरफेस फोटोथैरेपी मशीन है, जबकि 5 की डिमांड भेजी है। न वेंटीलेटर है, न डबल सरफेस फोटोथैरेपी मशीन।

सोनीपत: जरूरी सुविधाएं नहीं होने के कारण काफी बच्चें रेफर करते हैं और बच्चे की फिर मौत हो जाती है। अस्पताल की एसएनसीयू में 18 बेड हैं। वेंटिलेटर एक भी नहीं। दो बेड पर वार्मर खराब हैं। एक फोटोथैरेपी मशीन खराब पड़ी है। बच्चों को तत्काल एक्सरे की जरूरत पड़ जाती है तो नहीं हो पाता। एसएनसीयू में चार एमबीबीएस की पोस्ट खाली पड़ी हंै।

महेंद्रगढ़: उपनागरिक अस्पताल में बच्चों के डॉक्टर की नियुक्ती तो है, परंतु वह डेढ़ वर्ष से अनुपस्थित है।

जींद: सिविल अस्पताल में 4 बाल रोग विशेषज्ञ हैं। बाकी किसी सीएचसी या एसडीएच में बाल रोग विशेषज्ञ नहीं है।

अम्बाला: टर्शरी सेंटर पर शिशुओं की संख्या ज्यादा रहने से वहां इंफेक्शन मौत की मुख्य वजह बनती है।

यमुनानगर: स्पेशल न्यू बोर्न केयर यूनिट में चार वेंटिलेटर भेजे, लेकिन एक्सपर्ट स्टाफ नहीं। जिले के दो ही अस्पतालों में चाइल्ड स्पेशलिस्ट। ग्रामीण एरिया में बच्चे की तबीयत खराब हो जाए तो उसे न डॉक्टर मिल पाएगा और न इलाज।

कुरुक्षेत्र: जिला अस्पताल में 3 गायनीक्लोजिस्ट की जरूरत है, लेकिन एक ही है। गर्भवती महिलाओं को जिला अस्पताल से पीजीआई रेफर किया जा रहा है। बच्चों को ठंड से बचाव के लिए भी कोई खास इंतजाम नहीं है। गायनी वार्ड में 10 चिकित्सकों की जरूरत है, लेकिन तीन ही है।

कैथल: 18 में से दो वार्मर खराब हैं। कभी-कभी बच्चों की संख्या 30 को पार कर जाती है और ऐसे में वार्मर कम पड़ जाते हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर न तो बाल रोग विशेषज्ञ हैं और न ही बच्चों के लिए अलग से कोई व्यवस्था।

करनाल: नागरिक अस्पताल में एसएनसीयू में 18 बैड करने की फाइल हैड ऑफिस भेजी गई है। अस्पताल में 20 से 25 डिलीवरी रोजाना होती है। शिशुओं की संख्या क्षमता से ज्यादा बढ़ जाती है। जिले के मुख्य कस्बे असंध, घरौंडा, इंद्री में भी सुविधा नहीं है।

सिरसा: नागरिक अस्पताल में इन्क्यूबेटर नहीं है। अस्पताल के नर्सरी वार्ड में डॉक्टर के 6 पद हैं। एक खाली है।

हिसार: सिविल अस्पताल में 1 रेगुलर, 1 अनुबंधित बल रोग विशेषज्ञ है। स्पेशल न्यू बोर्न केयर यूनिट में बच्चों की केयर के लिए 3 मेडिकल ऑफिसर के पद स्वीकृत हैं कार्यरत सिर्फ एक है। यूनिट में 16 वार्मर हैं। कभी-कभी एक वार्मर में 2 बच्चों को रखना पड़ता है। इन्क्युबेटर की सुविधा नहीं है।

झज्जर: नागरिक अस्पताल में बीते 6 माह से शिशु रोग चिकित्सक नहीं है। शिशु से संबंधित कोई भी इमरजेंसी केस आता है तो उसे पीजीआई रेफर करना पड़ता है। वेंटिलेटर की सुविधा भी न होने से गंभीर हालत के शिशु रेफर किए जाते हैं।

रोहतक: सिविल अस्पताल रोहतक में दो किलो से कम वेट के बच्चों को कंगारू मदर केयर में 6 बेड पर इलाज दिया जाता है। सभी बेड फुल रहते हैं। 15 बेड की नर्सरी अक्सर फुल होती है। एसएनसीयू में चार चिकित्सकों की जरुरत है लेकिन दाे ही हैं।

पानीपत में एक वार्मर पर 3 बच्चे लेटाए गए थे। (फाइल फोटो)



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