
तो भरोसा रख दरबार-ए-इलाही का बंदे, मुझे भरोसा राम तु, दे अपना अनमोल। आत्म कृपा की 3 विधियां प्रथम सत्संग, सत्संग का सेवन करने से है। जैसे भूमि में बीज पड़ने से अंकुरण की प्रकिया आरंभ हो जाती है ऐसे सत्संग का सेवन करने से जो दैवीय गुण आपमें बीज रूप से विद्यमान है। जिसके भीतर वो चेतन तत्व विराजमान है वो सतचित आनंद स्वरूप प्रभु का अंश है उसमें वे समस्त दैवीय गुण विद्यमान है। इतना जरूर है भाई एक बीज बरसों बरस पड़ा रहता है क्योंकि वो किसान की मुट्ठी में नहीं आता। बीज के ढेर में से जब किसान मुट्ठी भरता है तो बड़भागी वही बीज होते हैं जो मुट्ठी में आ जाते हैं। फिर डाल देता है किसान उन्हें भूमि में। फिर भूमि यह नहीं देखती उल्टा पड़ा है या सीधा। मुट्ठी में आया है तो एक दिन अंकुरित हो जाएगा। उसी प्रकार जो आपकी तरह यहां आकर बैठ गया है अर्थात् मुट्ठी में तो आ गया है अब एक न एक दिन अंकुरित हो जाएगा। जिसके जीवन में सत्संग आ गया है जिसको सत्संगति में निष्ठा हो गई है। सोमवार को तीसरे दिन श्री जी कृपा समिति की ओर से कैंट बीपीएस प्लेनेटोरियम में आयोजित संत वाणी कार्यक्रम में श्रीहित अम्बरीष महाराज संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जिस दिशा में देखिए, जिस महापुरुष की वाणी सुनिए और जिस संत के बोल कान में पड़े तो आपको एक स्वर मिलेगा, एक स्वर। तेरी शरण सतगुरु मेरे पूरे, मन निर्मल होए संता धूरे, मन निर्मल होए संता धूरे, कर किरपा तेरे गुण गावां, कर किरपा तेरे गुण गावां।
श्रीहित अम्बरीष
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