अवनि केवल समतल सतह पर ही थोड़ी दूर तक चल पाती थी लेकिन अब वह 200 मीटर तक खुद को संभाल लेती है। ऐसा संभव हुआ है खेल के प्रति उसके जज्बे से। अब वह 25 मार्च से मैसूर में होने वाली प्रतियोगिता के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रही है। वह अपने सपने को साकार करने के लिए हर रोज पसीना बहा रही है, वहीं उसके परिजन भी उस पर पूरा फोकस कर रहे हैं। अवनि ने बताया कि एकता भ्याण से मिलकर ही उसमें खेलने का जज्बा जागा। एकता ने उसे इस कदर इंस्पायर किया कि वह अब खेल में ही अपना कैरियर बनाना चाहती है।
बेटी की जीत पर गांव से आई थी बधाई की कॉल
अवनि के पिता कुलबीर नैन ने बताया कि वे अपने बेटे का एडमिशन कहीं बाहर करवा रहे हैं, ताकि वह हॉस्टल में रहे और हमारा पूरा फोकस अवनि पर रह सके। अवनि की प्रैक्टिस के लिए किसी एक को हमेशा उसके साथ जाना होता है। करीब 6 माह पहले वह चल भी नहीं पाती थी, लेकिन अब वह दौड़ती है। जहां वह पहले 6 इंच से कूदने में भी असमर्थ थी वहां अब प्रैक्टिस करवा उसे 15 इंच से भी कूदना सिखाया जा रहा है। अवनि ने जब पहली बार मेडल जीता तो गांव से बधाई के लिए फोन आने लगे।
मां ने स्पेशल स्कूल खोलने की ठानी
अवनि की मां पूनम ने अपनी बेटी की प्रैक्टिस के लिए सामने आ रही परेशानियों को देखकर उसकी हिम्मत काे बढ़ाया। उन्होंने बताया कि जहां पहले स्कूल में एडमिशन के लिए अवनि के सामने परेशानी हुई। वह हॉली एंजल स्कूल ने दूर की। इसके बाद अब अवनि के सामने एक ट्रेनर की सबसे बड़ी परेशानी आन खड़ी है। अभी वे खुद उसे प्रैक्टिस करवाते हैं। अवनि की परेशानियों को देखते हुए वे एक स्पेशल स्कूल खोलेगी। इसमें अवनि की तरह दूसरे बच्चों को सभी सुख सुविधाएं मिलें।
मैं जब एकता मैम से मिली तो उन्होंने मुझसे कहा कि मैं बहुत कुछ कर सकती हूं। मुझे प्रैक्टिस करनी चाहिए। खेल में मैं अच्छा प्रदर्शन कर सकती हूं। इसके बाद मैंने हर रोज ग्राउंड में प्रैक्टिस करना शुरू कर दिया। मैं रायपुर में सिर्फ खेलने के मूड से गई। मैंने सोचा भी नहीं था कि मैं जीत सकती हूं। वहां मुझसे बहुत सीनियर आए हुए थे। मैंने सोचा था कि मैं सिर्फ मस्ती कर और खेल कर वापिस आ जाऊंगी। लेकिन जब मैंने 2 गोल्ड मेडल जीते तो मेरा हौसला अाैर बढ़ गया। मुझे लगा कि अब मुझे और मेहनत करनी चाहिए। मुझे अपना कैरियर खेल में ही बनाना है। मैं गोल्ड मेडल लेकर एकता मैम से भी मिलने गई। उन्होंने मुझसे कहा कि तूने तो पहली ही बार में छक्का लगा दिया। तुम और बहुत नाम कमा सकती हो। सिर्फ प्रैक्टिस पर जोर दो। तब से मैंने नेशनल के साथ साथ इंटरनेशनल स्तर पर खेलकर जीतने की ठान ली है। मुझे पहले स्कूल में भी जाना अच्छा नहीं लगता था। लेकिन जब मेडल जीतने के बाद मैं स्कूल में गई तो मैंने टीचर्स को गुड मॉर्निंग कहा तो सबका रिप्लाई कांग्रेचुलेशन ही था। तब से मैं पढ़ाई में भी मन लगाने लगी हूं।
मैंने टीचर्स को गुड मॉर्निंग कहा तो सबका रिप्लाई कांग्रेचुलेशन ही था
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