नगर निगम का कचरा प्रबंधन अपनी प्रक्रिया और भुगतान को लेकर सवालों के घेरे में हैं। नगर निगम द्वारा कंपनी 54 करोड़ 82 लाख रुपए का भुगतान न केवल नियमों को लेकर सवालों के घेर में हैं। बल्कि इसकी मॉनीटरिंग और बनाई कमेटी पर भी सवाल है। आरटीआई से हुए खुलासे के बाद अब सामने आया है कि नगर निगम मॉनीटरिंग के लिए कमेटी बनाने का दावा किया गया है।
उसके बताए गए प्रभारी को ही कमेटी के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इस प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट (पीएमयू) की मॉनिटरिंग व अप्रूवल के बगैर जय भारत मारूति कम्पनी (जेबीएम) को कुल 5,48,251 टन कूड़ा उठाने के बदले 54.82 करोड़ का किया भुगतान किया गया, उसके प्रभारी को यह तक नहीं पता कि इसकी कोई मीटिंग हुई थी या नहीं।
नगर निगम के कार्यकारी अधिकारी भी इस मामले से अनजान हैं। सवाल यह है कि क्या कुछ विशेष निगम अधिकारियों की खास मेहरबानी के चलते ही एजेंसी को निरंतर पेमेंट की जाती रही वह भी बिना किसी आवश्यक देखरेख के। जबकि निगम की ओर से खुद जारी दस्तावेज में स्पष्ट है कि बिल की मंजूरी पीएमयू की ओर अनुशंसा आधार पर होगी। यही कारण है कि एजेंसी को टेंडर दिए जाने से लेकर उसकी पेमेंट को लेकर अब उच्च स्तरीय जांच की मांग लगातार उठ रही है।
पैसे बचाने के लिए कमेटी बनाई या लुटाने के लिए
अब नगर निगम प्रशासन पर आरोप है कि निगम अधिकारियों से पैसे बचाने के लिए स्वतंत्र एजेसी से परहेज किया अथवा सरकारी अधिकारी ही कमेटी में शामिल कर अपनी मनमर्जी चलाने के लिए वह कमेटी बनाई गई, जिसकी कोई मीटिंग हुई भी या नहीं, उसका कुछ पता नहीं, क्योंकि जब इस बारे में आरटीआई से जानकारी मांगी गई तो तब निगम के सूचना अधिकारी ने यह जानकारी दी भी नहीं, और अब कमेटी के एक्सपर्ट उसमें प्रतिभागिता तक पर खुद सवाल उठा रहे हैं। जबकि आरटीआई कार्यकर्ता पीपी कपूर के अनुसार यहां नियमों की अनदेखी कर एक निजी एजेंसी को लाभ दिया गया है, मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी को उसकी सजा मिलनी चाहिए।
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