भगवान के भक्त बनो, उनके प्यारे बन जाओ और उनसे निवेदन करो-मेरी बुद्धि के रथ को, मेरे जीवन के रथ को संभालो मेरे भगवन। हे! प्रभु मैंने तो अपना जीवन रथ तुम्हें अर्पित कर दिया है, इसे जहां ले जाना चाहो, तुम ले जाओ। यह प्रवचन माता वैष्णवी धाम के आचार्य पवन शर्मा ने आयोजित सत्संग में कहे।
आचार्य ने कहा कि यह बात निर्विवाद सत्य है कि जब तुम्हारे जीवन के रथ को चलाने वाले भगवान हो जाए तो सारा जमाना भी तुम्हारे विरोध में उठ खड़ा हो गया हो तो भी तुम्हारा कुछ बिगड़ने वाला नहीं। जमाने को तुम्हारे सामने झुकना पड़ेगा, न केवल झुकना पड़ेगा, बल्कि उसे पराजित भी होना पड़ेगा, किंतु इस बात को हर समय ध्यान में रखना, आप अपने मन में यह बात लेकर कभी मत चलना कि मुझे अमुक व्यक्ति को अथवा इस दुनिया को झुकाना है।
हमें दुनिया को नहीं झुकाना किंतु अपने आप को झुकाना है। यह बात गांठ बांध लेना कि अपने को झुका लेने से ही अपने मालिक को पाया जा सकता है और यह भी सत्य है कि उसको पाने के बाद फिर किसी और को झुकाने की इच्छा होती ही नहीं है फिर तो लगता है कि सब अपने ही तो हैं, तो फिर किस को झुकाऊं? किसको हराऊं?आचार्य ने कहा कि महापुरुषों ने जीवन को तपोवन बनाने की प्रेरणा दी है। घर-गृहस्थी को भी तपोवन बनाओ। तपोवन में व्यक्ति मुस्कुराते हुए अपने को तपाता है और कहता है कि मेरी क्षमता बढ़ रही है।
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