युगों तक कष्टों को सहन करने के बाद जीवात्मा को मानव देह प्राप्त होती है। यह जीवन परमात्मा की निश्छल भक्ति में लगाकर बार-बार जन्म लेने से मुक्त हुआ जा सकता है। महाश्रमण संतश्री आनंद मुनि महाराज ने रविवार सुबह स्थानीय जैन स्थानक में श्रावकों के समक्ष ये शब्द कहे। उन्होंने कहा कि विभिन्न योनियों में जन्म लेने और फिर मर जाने की यात्रा करते हुए जीव को मानव देह की प्राप्ति होती है।
इस देह को परम तत्व की उपासना में रमण करवा कर जीवन को सार्थक किया जा सकता है। धर्म विवेचक, ज्ञान पुंज, प्रज्ञा पुरूषोत्तम श्री आनंद मुनि ने कहा कि संत ही केवल यम-नियम अथवा महाव्रत से बंधा नहीं होता, एक गृहस्थ को भी अनुव्रत की गरिमा का पालन करना होता है। प्रत्येक श्रावक को समेकित भक्ति में मन को रमा कर युग प्रर्वतक श्री महावीर भगवान की अपने प्राणों से सेवा करनी चाहिए।
अहिंसा, सत्य, अष्टांगयोग, ब्रह्मचार्य एवं परिग्रह ये पांच धर्म के मूल स्तंभ हैं। इनको जीवन में धारण कर मानव जन्म को धन्य बनाना चाहिए। यह तपस्या सांसारिक मन के लिए कठिन तो हो सकती है किंतु असंभव नहीं है। श्री आनंद मुनि ने कहा कि हर गृहस्थ को अपनी मर्यादा में रहते हुए गृहस्थ धर्म की पालना करनी चाहिए।
हर व्यक्ति की दिनचर्या में धनापोर्जान, भोग-उपभोग, सुनना-बोलना, भोजन शामिल है, इसमें धर्म को सम्मिलित कर दें तो कर्म पवित्र होंगे। धर्म के मार्ग पर चलकर जीवन को मर्यादित बनाया जा सकता है। व्यक्ति को उठते-बैठते, चलते हुए या सोते हुए परमेश्वर का ध्यान करना चाहिए। इस अवसर पर आईसी जैन, सुरेश जैन, मुकेश जैन, संदीप जैन, इंद्र जैन, ऊषा जैन, सुरेंद्र जैन, बबीता जैन, नवदीप इत्यादि उपस्थित रहे।
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